परम पूज्य आद्य गुरु शंकराचार्य के साथ इस धागे की शुरुआत करता हूँ!

by | Dec 29, 2020 | Sanatana Dharma

अद्वैत वेदांत को दृढ़ता से स्थापित करने वाले आदि शंकर ईसा से ५०८ वर्ष पूर्व केरल में जन्मे थे।
महादेव के अवतार माने जाने वाले शंकर जी ने गोविन्द भगवत्पाद जी से दीक्षा ली।

परम पूज्य आद्य गुरु शंकराचार्य के साथ इस धागे की शुरुआत करता हूँ!

अद्वैत वेदांत के प्रतिपादक श्री शंकर ने पूरे भारत में यात्रा की और सभी मतों का खण्डन करते अद्वैत को स्थापित करते “अहं ब्रह्मस्मि” का उद्घोष किया!
उस समय वेदों की समझ के बारे में मतभेद होने पर उत्पन्न चार्वाक, जैन और बौद्ध मतों को शास्त्रार्थों द्वारा खण्डित किया।
इन्होंने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक और छान्दोग्योपनिषद् पर भाष्य लिखा। वेदों में लिखे ज्ञान को एकमात्र ईश्वर को संबोधित समझा और उसका प्रचार तथा वार्ता पूरे भारतवर्ष में की।
भारत में चार कोनों पर चार शिष्यों हस्तामलक, त्रोटकाचार्य, पद्मपादाचार्य एवं स्वरूपाचार्य को भेज श्रृंगेरी, ज्योति, शारदा एवं द्वारिका आदि चार मठों की स्थापना की।
आचार्य शंकर ने ही दसनामी सम्प्रदाय की भी स्थापना की। गिरि, पर्वत, सागर (ऋषि भृगु) पुरी, भारती और सरस्वती (ऋषि हैं शांडिल्य) वन और अरण्य (ऋषि हैं काश्यप) तीर्थ और आश्रम (ऋषी अवगत)!
ये दस सम्प्रदाय दस पद्धतियाँ दर्शाते हैं।
छह वर्ष की आयु में ही प्रकाण्ड पण्डित हो चुके बालक को माता सन्यास ग्रहण करने नहीं देती थी सो बालक शंकर ने नदी किनारे मगरमच्छ द्वारा पैर पकड़ लेने का फायदा उठाते “माँ मुझे सन्यास लेने दो वरना ये मुझे खा जायेगा” कह माँ से सन्यास की अनुमति ले ली।
काशी पहुँच शंकर ने माँ अन्नपूर्णा से “ज्ञान वैराग्य सिद्ध्यर्थम् भिक्षं देहि च पार्वती” कह माँ से अनोखी भिक्षा मांगी।
कहते है स्वयं शिव ने चांडाल का भेष धर शंकर को अद्वैत की शिक्षा दी। नशे में धुत्त, कुत्तों को साथ लिये, अर्धनग्न, मलिन चांडाल को अपनी ओर आते देख शंकर ने कहा “दूर रह मुझसे।”
इस पर चांडाल बोला, “तुम किसे अछूत कह रहे हो? मेरे शरीर को अथवा आत्मा को? मैं तुम सब एक ही ईश्वर से बने है फिर अंतर कैसा?”

ये ज्ञान आद्य गुरु के लिये अद्वैत का आधार बना!
गुरु भगवत्पाद जी के पुछ्ने पर की तुम कौन हो “चिदानंदरूपं शिवोहं शिवोहं” का उद्घोष करने वाले शंकर ने मंडन मिश्र जैसे प्रकाण्ड पंडित को शास्त्रार्थ में हराया।
श्री शंकर की कुण्डली में अल्पायु लिखी थी सो ३२ वर्ष की आयु में भारत भर में सनातन में नवजीवन भर शंकराचार्य ने ४८६ ई•पु• में समाधी ले ली!
जगदम्ब!