“मंदिर व उनके स्थापत्य”

by | Dec 29, 2020 | Sanatana Dharma, Temples

मंदिर निर्माण की कला सदियों पुरानी है। वैदिक काल से ही मंदिरों के वर्णन मिलते हैं।
देवालय, कोविल, देओल, देवस्थानम्, प्रसाद आदि अनेक नामों से विदित मंदिर अनेक तरह से निर्मित किये जाते हैं।

"मंदिर व उनके स्थापत्य"

मंदिर निर्माण के पुर्ववर्ती 3 प्रकार थे:
१.संधर (प्रदक्षिणा पथ)
२.निरंधार (प्रदक्षिणा पथ के बिना)
३.सर्वतोभद्र (सभी दिशाओं से प्रवेश किया जा सके)
इस काल के कुछ प्रमुख मन्दिरों में है देवघर (यूपी) का मंदिर, उदयगिरी(एमपी) आदि!
सनातन मंदिर के मुख्य स्वरुप:
गर्भगृह(देवता का निवास)
मण्डप(प्रवेश कक्ष जोकि काफी बड़ा होता है)
पूर्वोतर काल में इन पर शिखर बनाये जाने लगे जिन्हेशिखर उत्तर भारत में व विमान दक्षिण भारत में कहा जाता है।व वाहन अर्थात मंदिर के अधिष्ठाता देवता की सवारी। ये स्तम्भ या ध्वजा के साथ गर्भगृह के साथ कुछ दूरी पर रखा जाने लगा।
भारत के मंदिरों को मुख्यत: दो शैलियों में बाँटा जाता है:
उत्तर की नागर व दक्षिण की द्रविड़।

वेसर शैली इन दोनों शैलियों का मिश्रण है जिसमें नागर और द्रविड़ की चुनी हुई विशेषताएँ होती हैं।

"मंदिर व उनके स्थापत्य"

नागर शैली के मंदिरों में मुख्य द्वार पर गंगा यमुना जैसी नदियों को दिखाया जाता था व द्रविड़ में “गोपुरम”(मुख्य द्वार) पे द्वारपाल बनाये जाते थे।
इसी प्रकार मिथुनों नवग्रहों और यक्षों को द्वार रक्षा के लिये रखा जाता था।
नागर शैली की खास बात ये की सम्पुर्ण मंदिर एक विशाल चबूतरे पे बनाया जाता है और उस तक सीढ़ियाँ होती हैं।
आमतौर पर इनमें द्रविड़ के विपरीत कोई चारदिवारी या दरवाजे नहीं होते।
मन्दीर में घुमावदार गुम्बद होता है। पुराने समय में एक शिखर होता था अब कई होते है।
उदा• कोणार्क सूर्य मन्दिर
मंदिर का गर्भगृह सबसे उँचे शिखर के नीचे हित है। चौकोर शिखर जो उपर जाकर चोटी बनाता है को “रेखा प्रासाद” कहा जाता है।
नागर शैली कई उपशैलियों में विभाजित है जैसे फमसाना, वलभी इत्यादी।
गुप्त काल के सबसे पुराने संरचनात्मक मंदिर मध्य प्रदेश में पाये जाते हैं। ये साधारण किस्म के आडम्बरहिन पूजा स्थल होते हैं।
इनमें छोटा मण्डप होता है जो चार खम्भों पे टिका होता है।
उदयगिरी विदिशा के मंदिर।
श्रेष्ठ नागर शैली का आरम्भिक उदाहरण देवगढ़ यूपी का पंचायतन वास्तुकला से निर्मित मंदिर है।
रेखा प्रासाद शैली से बना शिखर गुप्त काल का सर्वश्रेष्ठ कलात्मक मंदिर है।
चार उपदेवालयों में विष्णु की मूर्तियाँ हैं।
शेषशयन, विष्णु का वह रूप है जब उन्हें अपने वाहन शेषनाग, जिसे अनंत भी कहा जाता है,
पर लेटा हुआ दिखाया जाता है, नर-नारायण जीवात्मा और परमात्मा के बीच की चर्चा को दर्शाता है, गजेंद्रमोक्ष मोक्ष-प्रािप्‍त की कहानी है।
इन उद्भृतियों से यह पता चलता है कि इस मदिंर में परिक्रमा दक्षिण से पश्‍चिम की ओर की जाती थी जबकि आजकल प्रदक्षिणा दक्षिणावर्त (clockwise) की जाती है।
यह मंदिर भी पश्चिमाभिमुख है जबकी ज्यादातर पूर्वाभिमुख होते हैं!
अन्य उदाहारणों में खजुराहो का लक्ष्मी मंदिर, कंदरिया महादेव मंदिर, शिवसागर मंदिर(आसाम) आदि हैं!
द्रविड़ शैली के मंदिर चारदिवारी से घिरे होते हैं। इस दिवारी के बीच प्रवेश द्वार को गोपुरम कहते हैं।
मन्दिर के गुम्बद का स्वरूप (विमान) सीढ़ीनुमा पिरामिड की तरह होता है जो ज्यामितीय रुप से उठा होता है न की नागर की तरह मोड़दार।

"मंदिर व उनके स्थापत्य"

मंदिर के परिसर में तालाब अवश्य होता है। उप देवालय या तो मुख्य गुम्बद के भीतर ही होते हैं या फिर उसके आस पास।
इन मंदिरों में एक साथ कई छोटे बड़े कक्ष नहीं होते व अक्सर मुख्य गर्भगृह का गुम्बद सबसे छोटा होता है।

"मंदिर व उनके स्थापत्य"

जब मंदिर विस्तार होता है तो अक्सर बाहर ऊँची चारदिवार और उँचे गोपुरम बनते है।
उदा के तौर पर त्रिची का श्रीरंगम मंदिर। इसमें चार आयताकार अहाते हैं व हर एक का गोपुरम!
द्रविड़ मन्दिरों की भी उपशैलियाँ होती हैं।
मूल आकृतियां पाँच प्रकार की होती हैं: वर्गाकार, आयताकार, अंडाकार, वृत्त और अष्टा स्र।
इस शैली में खड़े पत्थरों को काट कर कई मंदिर बनाये गये।
तंजावुर का बृहदेश्‍वर शिव मदिंर समस्त भारतीय मदिंरों में सबसे बड़ा और ऊँचा है। इसका निर्माण कार्य 1009 ई. के
आस-पास राजराज चोल द्वारा कराया गया था। मंदिर निर्माण उस काल की एक
विशेष गतिवधि थी, जब 100 से अधिक महत्‍वपर्णू मन्दिरों का निर्माण हुआ।
चोल काल के अनेक मंदिर आज भी बेहतर अवस्‍था में पाए जाते हैं और उनमें से कई मंदिरों में आज भी पूजा होती है।
यही वह मदिंर है जहाँ दर्शक को पहली बार दो बड़े गोपुर देखने को मिलते हैं।
ये तस्वीर है प्रसिद्ध लेपाक्षी मन्दिर की।
एक ही बैल की आकृति को अलग अलग स्थान से ढ़क कर अलग भाव पैदा किये जा सकते हैं!
है न कमाल?
16 वीं शताब्दी में बने इस मन्दिर की शिल्पकला अनूठी है। नमन है उन शिल्पकारों को।

"मंदिर व उनके स्थापत्य"
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